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Wednesday, October 25, 2017

love से ज्यादा महत्वपूर्ण desires है, दिमाग के लिये

मेघा मैत्रैयी
कभी करीब 60 की उम्र के एक आदमी से मुलाकात हुई थी, अस्पताल में इंटर्नशिप के दौरान। बुरी तरह डिप्रेशन में था। काफी सीधा-साधा किस्म का इंसान था जो जिंदगी भर कोई ना कोई जिम्मेदारी उठाता रहा परिवार की, पर अब उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके सारे रिश्ते खराब क्यों हो गए।

बीवी लड़ती रहती थी, बच्चे उपेक्षा करते थे, रिश्तेदारों में भी कोई वैल्यू नहीं थी। कुल मिला कर वह पनीर की सब्जी में आलू की तरह हो गया, जिसको लोग चुन-बिछ कर अपनी प्लेट में नहीं डालते। बस इसीलिए दुःखी था।

बार -बार बोलता कि मैंने unconditional प्यार किया सबसे पर अब नफरत हो गयी है।

समस्या इस unconditional love के concept में ही है। ये exist ही नहीं करता। पर हम इस बात को समझते ही नहीं है।

एक माँ अपने बच्चे से प्यार करती है क्यूंकि ऐसा करने से उसकी maternal instinct को सन्तुष्टि मिलती है। एक  सैनिक अपने देश के लिये जान दे देता है खुशी-खुशी क्योंकि उसका दिमाग उसे बताता है कि वो अगर ऐसा नहीं करेगा तो सन्तुष्ट नहीं होगा। एक इंसान पूरे जीवन दूसरो की सेवा में लगाता है क्यूंकि उसे ऐसा करने से खुशी और सन्तुष्टि मिलती है।

हमें लगता है कि इनका unconditional प्यार और निस्वार्थ भाव है,  इनके कर्मो के पीछे। लेकिन नहीं। दिमाग स्वार्थी होता है, वो आपसे तब तक कोई काम नहीं कराएगा जब तक उसको उस से किसी प्रकार की सन्तुष्टि ना मिले।

उदाहरण के लिए एक ऐसा मरीज जिसके hypothalamus में feeding centre को कोई ऐसी क्षति पहुंच गयी हो कि वह काम करना बंद कर दे, तो उस इंसान को भूख लगेगी ही नहीं। उसका शरीर कमजोर होता जाएगा, वह मरने की कगार पर पहुंच जाएगा पर खायेगा नहीं, क्योंकि दिमाग ने उसे यह बताना बन्द कर दिया है कि खाना उसकी जरूरत है, और जो चीज  आप के दिमाग के हिसाब से आपके भले के लिये जरूरी नहीं है वो आप नहीं करेंगे, भले ही आपकी हालत कितनी भी critical हो जाये।

यही बात प्यार के साथ भी है। हम सिर्फ इसीलिए दुसरो का ख्याल नहीं रखते क्योंकि सामने वाले की जरूरत है, बल्कि हमारे लिये जरूरी है ऐसा करना।

Unconditional love तब होता जब कोई अपना आपको पचास जूते रोज मारे, आपको 3rd डिग्री टार्चर दे ,आपकी जिंदगी में डंडा किये रहे लेकिन तब भी आप उसी दृढ़ता से उससे प्यार करते रहें; अगर आप ऐसा नहीं कर सकते तो इस फालतू कॉन्सेप्ट को भूल जाइये और अपनी वैल्यू create करना सीखिए।

आज गृहणियां कितना भी कर दे, उनकी वैल्यू अक्सर कमाऊं पति से कम होती है परिवार में, क्योंकि ये हर काम जिम्मेदारी समझ कर करती है बेवकूफों की तरफ( yes, they are not निस्वार्थ, they are बेवकूफ)। वो कभी अपने काम का वैल्यू नहीं लेती क्योंकि हमारे सामाजिक ताने - बाने ने यह बात दिमाग में फिट कर दी है कि valuable काम वही है जिसकी कोई कीमत हो नोटों में।

मुझे समाज को देखते हुए यह लगता है कि आपमें से ज्यादातर लोग granted हैं, किसी ना किसी के लिये। तो एहसान ना जताये, घमण्ड ना दिखाये पर अपनी value create करना शुरू करें; क्योंकि दुनिया में कोई नहीं है जो आपसे unconditional love करता है।  love से ज्यादा महत्वपूर्ण desires है, दिमाग के लिये। आप जब तक जरूरत हैं, तभी तक प्यारे हैं। ना तो आपकी गलती है ना आपके उपेक्षा करने वालों की, पर इस नालायक दिमाग के काम करने का तरीका ही  यही है। ☺

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