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Friday, February 15, 2013

कैसे टूटें जाति की बेडि़यां

बंधुराज लोण
आजादी मिलने के बाद से आज तक स्वतंत्र भारत में आरक्षण पर जितनी चर्चा हुई है उतनी दूसरे विषय पर शायद ही हुई होगी। गणतांत्रिक भारत के इतिहास में आज तक का यह सर्वाधिक विवादित मुद्दा रहा है। वैसे भारत में आरक्षण का इतिहास काफी पुराना रहा है। परंपरा के अनुसार ऊपरी जातियों को आरक्षण दिया ही गया था, पर नियमानुसार इस देश में छत्रपति शाहूजी महाराज ने पहली बार 26 जुलाई 1902 को अपने प्रांत में आरक्षण देने का कानून बनाया था। भीमराव अंबेडकर कहते थे कि इस देश में श्रम का ही नहीं, श्रमिकों का भी विभाजन किया जा चुका है। इसीलिए जाति आधारित आरक्षण दिया गया, पर अब उनके नाती व भारतीय रिपब्लिकन पार्टी के नेता प्रकाश अंबेडकर ने इस राजनीतिक आरक्षण को रद करने की मांग की है। उन्होंने मांग की है कि स्कूल छोड़ने पर दिए जाने वाले प्रमाण पत्र से जाति का उल्लेख हटा दिया जाए। अंबेडकर ने गोलमेज परिषद् और साइमन कमीशन के सामने 1920 में अनुसूचित जातियों को आरक्षण देने की मांग की थी। फिर 1932 में जैसे ही ब्रिटिश सरकार ने अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण बहाल किया, महात्मा गांधी ने पुणे में अनशन शुरू कर दिया। तब महात्मा गांधी व अंबेडकर के बीच पूना पैक्ट हुआ और उसके बाद अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र की कल्पना साकार हुई। आज धारा 334 के तहत राजकीय आरक्षण मिलता है। तब से यह 10-10 साल के लिए बढ़ाया जाता रहा है। जाति आधारित समाज में दलित राजनीतिक सत्ता से वंचित थे। आरक्षण के चलते उन्हें सीधे संसद पहुचने का अवसर मिला। प्रकाश अंबेडकर के मुताबिक आरक्षित सीट सही अर्थ में अनुसूचित जाति के प्रतिनिधि का चुनाव नहीं करती, बल्कि उससे खड़ा हुआ उम्मीदवार राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व करता है। आरक्षित सीट से चुने गए सबसे ज्यादा सांसद समाजवादी पार्टी के हैं और नौकरी में प्रोन्नति के लिए आरक्षण का इसी ने विरोध किया है। प्रकाश अंबेडकर के सपा के इस विरोधाभास पर सवाल उठाया है, जिस पर विवाद शुरू हो गया है। शरद पवार तथा शिवसेना ने उनका समर्थन किया है। यहां काशीराम का जिक्र करना भी जरूरी है। वह आरक्षण को लेकर कभी उत्साही नहीं रहे। उनका कहना था की मांगने से अच्छा खुद देने की स्थिति में पहुंचना चाहिए। इसलिए उन्होंने खुद आरक्षित सीट से कभी चुनाव नहीं लड़ा था। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और सत्ता हासिल की। सवाल उठता है कि यदि कांशीराम यह कर सकते हैं तो आरक्षण की क्या जरुरत है? कुछ समय पहले चुनाव के दौरान शरद पवार महाराष्ट्र में रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसदों को चुनकर लाए थे। विशेष बात यह थी की इनमें से किसी ने भी आरक्षित सीट से चुनाव नहीं लड़ा था। उस समय राजनीतिक आरक्षण खत्म करने की मांग उठी थी। वर्तमान में संसद में आरक्षित सीटों से चुनकर आए 123 सांसद हैं। उन्हें अपनी जाति से कितना प्यार है? अनुसूचित जाति के लोगों पर होने वाले अत्यचार के संबंध में उन्होंने कब आवाज उठाई? आरक्षण से अनुसूचित जाति का संगठन मजबूत नहीं होता है। प्रकाश ने सियासी दलों से अपील की है कि वे बिना आरक्षण के ही अनुसूचित जाति के लोगों को उम्मीदवार बनाएं। उनकी इस मांग को महाराष्ट्र के सवण विचारकों ने समर्थन दिया है। यह होना भी चाहिए, लेकिन क्या राजनीतिक दल अनुसूचित जाति के लोगों को मौका देंगे? इसमें संदेह नहीं कि आरक्षित सीट से चुनकर आए विधयाकों और सांसदों का झुकाव जाति की तुलना में पार्टी के प्रति अधिक रहेगा। अपने यहां राजनीति में दूसरा कोई विकल्प भी नहीं है। ऐसा होने के बावजूद यह तय है कि जाति आधारित राजनीतिक आरक्षण रद करने की मांग को अनुसूचित जाति वर्ग के लोग और उनके नेतागण अपनी मंजूरी कभी नहीं देंगे। राजनीति में आरक्षण को रद किए जाने से जातिवाद कम होगा, इस समझ का भी कोई कारण नजर नहीं आता है। 1932 में बाबासाहेब अंबेडकर ने कास्ट इन इंडिया (भारत में जातिवाद) नामक शोध पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया था कि जाति किस तरह राष्ट्र विरोधी और विकास विरोधी है। उन्होंने जाति के भेदभाव को खत्म करने की मुहिम शुरू की थी और संविधान में कानूनी तौर पर जाति को खत्म करने भी कोशिश की, लेकिन भारतीय जनमानस पटल से न जाति गई और न जातिगत शोषण ही खत्म हुआ, बल्कि उसका स्वरूप बदल गया। आज उन्हीं अंबेडकर और कांशीराम के नाम पर एक बार फिर जातिवादी आंदोलनों को हवा दी जा रही है। इससे अंतत: जातिगत व्यवस्था और जाति आधारित भेदभाव खत्म होने के बजाय बढ़ेंगे ही। अब सवाल है स्कूल छोड़ने पर दिए जाने वाले प्रमाण पत्र से जातिसूचक नाम हटाने का। सही मायनों में देखा जाए तो इस मांग का विरोध करने का कोई कारण नजर नहीं आता। आज भी महाराष्ट्र में लाखों बौद्ध धर्मावलंबी ऐसे हैं जिन्होंने स्कूल के प्रमाण पत्र में जाति का उल्लेख नहीं करने का आग्रह किया है, लेकिन सरकार उन्हें यह मौका नहीं देना चाहती है। स्कूल के प्रमाण पत्र में से यदि जातिसूचक नाम को हटा भी दिया जाता है तो उन्हें मिलने वाली सुविधाओं पर उसका कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि जाति प्रमाण पत्र तो अलग से मिलता ही है। जाति प्रमाण पत्र न होने की सूरत में आज भी उस जाति को मिलने वाले लाभ व्यक्ति विशेष को नहीं मिलते हैं। फिर भी यह नहीं समझ लेना चाहिए कि कागज में से जाति को निकाल देने से बहुत कुछ हासिल हो जाएगा। यह जाति की बेडि़यां तोड़ने के लिए अब तक किए गए प्रयासों की अगली कड़ी होगा। महाराष्ट्र में जाति के भेदभाव को खत्म करने के अनेक प्रयास हुए। बाबा साहेब अंबेडकर ने अंतरजातीय विवाह को जातिगत भेदभाव को खत्म करने का प्रभावी मार्ग बताया था, लेकिन आज भी अंतरजातीय विवाह पर ऑनर किलिंग हो रही है। वीर सावरकर ने भी जाति की बेडि़यां तोड़ने की मुहिम चलाई थी, लेकिन वह भी अपर्याप्त ही रही। अंतरजातीय विवाह, स्त्री-पुरुष समानता, सभी को समान शिक्षा की राह इतनी आसान नहीं है। राजनीतिक आरक्षण जातिगत भेदभाव को खत्म करने का उपाय नहीं, बल्कि जातीय प्रदूषण फैलाने का हथियार है। आरक्षण सामान अवसर प्राप्त करने का एक हिस्सा मात्र है। जब समान अवसर प्राप्त हो गए तो उसकी जरूरत खत्म हो जानी चाहिए। महाराष्ट्र में इस तरह के विवाद पहले भी होते रहे हैं और विवाद के परिणाम के तौर पर हर बार कोई न कोई सकारात्मक पहल जरूर हुई है। ऐसे विवादों का होना इस लिहाज से भी अच्छा है कि उनसे एक विमर्श होता है और वह विमर्श सामाजिक चेतना को जगाने का काम करता है। लिहाजा, ऐसे मसलों पर वाद-विवाद होना चाहिए, क्योंकि इससे सकारात्मक सामाजिक बदलाव की संभावना से इन्कार नहींकिया जा सकता। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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