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Sunday, July 1, 2012

कौन कहता है-कविता

कौन कहता है


कौन कहता है
जिंदगी खराब है
असल में जीने वालों
की नीयत ज्यादा खराब है
हम सिर्फ लेना चाहते है
अपनों से गैरों से , प्रकृति से
कुछ भी ,कैसे भी ,कभी भी
लेकिन कुछ देना ,नहीं चाहते
सब कुछ प् लेने की चाहत में
सब कुछ खोते चले जाते है
क्योंकि हम भूल जाते है ,
प्रकृति संतुलन चाहती है
जितना हम दूसरों से ,प्रकृति से लेते है
उतना ही हमें
वापस भी करना होता है
शायद यही भूल जाते है
हम इस जिंदगी में
इसीलिये लोग कहते है
जिंदगी खराब है
पर मै तो कहता हू कि
जीने वालों की
नीयत ज्यादा खराब है

२ मेरी बेटी आन्या के लिए कविता 

उसका गिरना
और फिर  संभलना
उसका रोना और फिर हँसना
भान जी (भगवान )की
फोटो को प्रणाम करना
फिर उनके साथ खेलना
और खेलते हुए
भान जी को पटक देना
और फिर प्रणाम करना
ऐसा ही चलता है
दिन भर ,रात भर
और बचपन भर
कुत्ते को देखकर खुश होना
फिर उसके साथ खेलना
और उसे मारना
उससे बिलकुल नहीं डरना
चिडियों ,बारिश ,पानी
को देखकर चहचहाना
घर से ज्यादा बज्जी (बाजार )
जाने की जिद करना
और बाहर मन लगना
हमेशा मुस्कराना
रोते रोते भी खिलखिलाना कर हँसना
ऐसे ही चलता रहा है
उसके बचपन भर
लेकिन क्या ये चलेगा
जिंदगी भर
हम क्यों बड़े होते है
हम क्यों समझदार होते है ,
जिंदगी का असली
आनद तो नादानी में है
बचपन में है
जहाँ असली जीवन है
वास्तविक जीवन है
बाकी तो सब आभासी है .

 स्वरचित -शशांक द्विवेदी 


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