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Monday, January 30, 2012

‘आधार’ पर राजनीति


‘आधार’ पर राजनीति
भारतीय विशिष्ट पहचान संख्या प्राधिकरण द्वारा भारत के नागरिकों को प्रदान की जा रही विशिष्ट पहचान संख्या ,आधार कार्ड परियोजना अन्य कई सरकारी योजनाओ की तरह अधर में लटकती हुई दिख रही रही हैं  तीन  साल पहले विशिष्ट पहचान प्राधिकरण यानी यूनीक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी (यूआइडीआइए) का गठन किया गया था। इसका मकसद नागरिकों की पहचान और सामाजिक योजनाओं का लाभ उन तक पहुंचाने के लिए एक सुरक्षित तकनीकी बॉयोमेट्रिक डाटाबेस मुहैया कराना था। मूल निवास प्रमाण पत्र, राशनकार्ड, मतदाता पहचान पत्र और अब आधार योजना के अंतर्गत एक विशिष्ट पहचान पत्र हरेक नागरिक को देने की योजना थी ।  आईटी दिग्गज  नंदन नीलकेणी को इसका निदेशक बनाकर पांच साल में करीब 60 करोड़ लोगों को विशिष्ट पहचान पत्र यूआइडी या आधार कार्ड देने का लक्ष्य रखा गया। यूआइडी को शुरुआती तौर पर 3,000 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया। हालांकि अब सरकार के भीतर से ही योजना के औचित्य पर सवाल उठने लगे हैं। योजना आयोग, गृह मंत्रालय के बाद वित्त मंत्रालय से संबंधित संसद की स्थायी समिति ने भी सुरक्षा जोखिम, निजता के संरक्षण के प्रावधानों की कमी और फिंगर प्रिंट और पुतलियों के स्कैन की तकनीक को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है। संसदीय समिति ने नेशनल आइडेंटिफिकेशन विधेयक को खारिज कर दिया है। 
वित्तीय मामलों पर यशवंत सिन्हा की अगुवाई वाली संसदीय समिति ने नैशनल आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया बिल को उसके मौजूदा स्वरूप में अस्वीकार्य  कर दिया है। समिति ने सवाल उठाया है कि नंदन नीलकेणी के नेतृत्व में यूआईडी प्रॉजेक्ट संसद से मंजूरी लिए बिना लाखों लोगों की निजी जानकारी कैसे इकट्ठा कर रहा है। अगर एनआईए बिल पास हुआ होता तो यूआईडी प्रॉजेक्ट को कानूनी आधार मिल गया होता, लेकिन कमिटी के मुताबिक समस्या यह है कि सरकार ने क्यों यूआईडी को बिनी किसी कानूनी आधार के तकरीबन तीन साल तक काम करने दिया। इस बीच उसने नाम, पते, फिंगरप्रिंट और आइरिस स्कैन का बड़ा डाटाबेस तैयार कर लिया है।  यूआईडी प्रॉजेक्ट के तहत जारी किए गए आधार कार्ड गैरकानूनी प्रवासियों को भी मिल सकता है, जिससे उन्हें सामाजिक क्षेत्र से जुड़ी योजनाओं का फायदा उठाने का मौका मिलेगा और ऐसे में उन्हें यहां की नागरिकता हासिल करने का रास्ता मिल सकता है। संसदीय समिति की तरफ से जारी रिपोर्ट में बायोमीट्रिक डाटा के इस्तेमाल से जुड़ी तकनीकी चिंताएं उठाई हैं। इनमें इकट्ठा किए गए डाटा की सुरक्षा और गोपनीयता से जुड़ी बातें शामिल हैं। 
दूसरे सरकारी मंत्रालय भी यूआईडी को लेकर उत्साहहीन हो गए हैं, खासतौर पर गृह मंत्रालय और वित्त मंत्रालय। गृह मंत्रालय तो नैशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) प्रॉजेक्ट के तहत नागरिकों की अपनी फेहरिस्त तैयार कर रहा है। यहां तक कि योजना आयोग ने भी सांसदों से कहा है कि यह प्रोजेक्ट अपने मूल दायरे से बाहर चला गया है। 


साल 2007-08 से 2010-11 के दौरान इस प्रॉजेक्ट पर कुल 3,474 करोड़ रुपए खर्च किए गए। साल 2011-12 में इसके लिए 4,113 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया गया। जनगणना के दौरान ही इस प्रॉजेक्ट के लिए नाम और पता जैसे ब्योरे लिए गए। अब सूचना प्रौद्योगिकी विभाग (डीआईटी) की अगुवाई में बायोमीट्रिक डाटा जुटाने का काम अलग से शुरू किया जाएगा। 
दरअसल केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेकसिंह अहलुवालिया द्वारा बनाये गए इस चक्रब्यूह का शिकार बन रहे हैं नीलकेणी, जो पिछले वर्षों से अपने अथक प्रयास के द्वारा भारत के प्रत्येक नागरिक को उसकी अपनी एक पहचान पत्र के द्वारा भारतीय होने का अधिकार प्रदान कर रहे हैं। लेकिन यदि चल रहे हालत को माना जाय तो वह समय दूर नहीं है कि किसी दिन नंदन नीलकेणी इस चापलूस और चाटुकारों की दुनिया को त्यागकर अपनी आईटी की दुनिया में वापस चले जाएँ ।. 
हालत यह है कि गृह मंत्री चिदम्बरम ने इस विभाग पर होने वाले खर्चों को फिजूल खर्च बताया है और इससे प्रेरित होकर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने अगले वित्तीय वर्ष (2012-13) में यूआईडीए को आवंटित होने वाले कुल राशि में 50 फीसदी की कमी कर दी है। प्रधान मंत्री जो कि योजना आयोग के अध्यक्ष भी होते हैं, ने इस विषय पर किसी भी प्रकार की “दखलंदाजी” अब तक नहीं की है, लेकिन प्रधान मंत्री कार्यालय के सूत्रों के मुताबिक, वे स्वयं इस घटनाक्रम से स्तब्ध हैं। सूत्रों के मुताबिक, प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के “व्यक्तिगत अनुरोध” पर ही नंदन निलेकनी अपनी आईटी की दुनिया को छोड़ कर देश के प्रत्येक नागरिक को एक भारतीय होने का पहचान पत्र और नागरिक संख्या उपलब्ध कराने के लिए यूआईडीए का कार्यभार संभाला था। वास्तव में यह दलगत राजनीति और कुंठित मानसिकता  का परिणाम है
इस मुद्दे पर गहरी  पड़ताल की जाये  तो  ऐसा प्रतीत होता है कि गृहमंत्रालय आधार की बढती लोकप्रियता को कमजोर कर नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) को प्रमुखता देना चाहता है।  एनपीआर भी लगभग ‘आधार’ जैसा ही एक प्रयास है जो देश में लोगों कि आबादी के अतिरिक्त कुछ अन्य सूचनाओं को एकत्रित कर रहा है। चुकि इस कार्य का करता-धर्ता गृह मंत्रालय है और गृह मंत्री की देख रेख में है, इसलिए ‘आधार’ के बजट में कटौती कर उसे प्रोत्साहित किया जा सकता है। इतना ही नहीं, गृह मंत्रालय ने तो यूआईडीए की स्थापना और इसकी स्वायतत्ता पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। सूत्रों के अनुसार यूआईडीए की स्थापना और इसकी स्वायत्ता तब तक मान्य नहीं है जब तक नेशनल ऑथोरिटी ऑफ़ इंडिया बिल 2010 संसद द्वारा पारित नहीं हो जाता। 
कुछ राजनीतिज्ञों के अनुसार यह कैसे संभव है कि जिस संस्था का कोई संवैधानिक आधार नहीं हो, भारत की संसद उसकी स्थापना और स्वायत्ता को क़ानूनी रूप ना दे दे, तब तक इस पर इतनी बड़ी राशि का व्यय तो तर्क संगत नहीं लगता, साथ ही, इसके द्वारा इस स्थिति में ‘आधार कार्ड’ निर्गत करना क्या क़ानूनी दस्तावेज हों सकता है?” यूआईडीए अब तक एक करोड़ आधार कार्ड बनाकर वितरित कर चुका है और आगामी 2014 तक साठ करोड़ आधार कार्ड वितरित करने का लक्ष्य है।
एक बात समझ में नहीं आती कि आधार परियोजना को शुरू किये जाने के पहले इससे सम्बंधित आपत्तियों की मसलन सुरक्षा और गोपनीयता सम्बन्धी बातों की ठीक ढंग से पड़ताल क्यों नहीं की गई ?अब जब परियोजना पर तीन साल से काम शुरू हो चुका है और इस पर अरबों रुपये खर्च किये जा चुके है तब इसे बंद करने की बात की जा रही है ,इसके औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगाया जा रहा है .क्या ये न्याय संगत है ?अब इस पर राजनीति भी शुरू हो गई है। इसका विरोध करने वाले अगर संजीदा थे तो तीन साल पहले प्रश्न उठाते। सच बात तो यह है कि देश में जो हालत बन रहे है उसे देख कर तो यही लगता है कि आम आदमी के लिए शुरू की गई इस परियोजना का भविष्य अधर में लटक चुका है ।
लेखक
शशांक द्विवेदी 


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