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Tuesday, January 17, 2012

उम्मीदों का साल !!


आम आदमी की उम्मीदों का साल !!
नए साल में एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने भ्रष्टाचार मुक्त भारत का संकल्प लिया है और मजबूत लोकपाल बिल पास कराने की वकालत की है । बीते साल अगर उनके वक्तव्यों और वादों पर गौर करे तो पता चलता है उन्होंने देश की आम जनता से सिर्फ वादे किये है,सपने दिखाए है पर उनको पूरा करने के लिए वास्तविक धरातल पर कुछ नहीं किया है । इसका एक सबसे बड़ा उदाहरण है कि पिछले साल अगस्त में जब अन्ना हजारे का अनशन प्रधानमंत्री और संसद की पहल पर तोडा गया था उस समय जिन तीन बातों पर  संसद ने  सिध्धान्ततः सहमति जताई थी मसलन  सिटीजंस चार्टर, निचले स्तर की नौकरशाही को लोकपाल के तहत रखना  और  राज्यों में लोकायुक्त की स्थापना । उनमे से प्रस्तावित कमजोर लोकपाल में सिर्फ एक राज्यों में लोकायुक्त की स्थापना को रखा गया है । जबकि इसका भी पुरजोर विरोध सरकार के सहयोगी दल कर रहे है ,अधिकांश क्षेत्रीय दल इसका विरोध कर रहे है जिसको देखते हुए यह भी पारित  लोकपाल बिल में रह पायेगा या नहीं इस पर भी संशय  है । कहने का मतलब यह कि सरकार जो वायदे आम आदमी से करती है ,उसको वह पूरा करे ये जरुरी नहीं है । उस समय अन्ना का अनशन तुडवाना सरकार की प्राथमिकता में था उसके लिए चाहे जो भी वायदे करने  पड़ते  ,सरकार ने किये  । यही वजह है कि आज देश के सामने प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचार के विरुद्ध संकल्प की कोई विश्वसनीयता जनता में रही नहीं ।   
बीते साल २०११ में दो बड़ी घटनाये हुई .पहली यह कि अन्ना आन्दोलन के माध्यम से देश में फैले व्यापक भ्रष्टाचार पर  आम आदमी का आक्रोश कई दशको बाद सड़क पर आया ,उसकी उम्मीदें,उसका विश्वास जगा की अब इस देश में कुछ परिवर्तन  होगा । दूसरी घटना यह कि साल बीतते बीतते आम आदमी का विश्वास और उसकी उम्मीदे दोनों एक साथ टूट गए । इतना कमजोर लोकपाल बिल भी संसद में पारित नहीं हो सका । यूपीए गठबंधन के सहयोगी राजद के एक सांसद ने तो खुलेआम राज्यसभा में लोकपाल की प्रतिया फाड़ दी ।  सांसदों ने एक बार फिर से साबित कर दिया कि वास्तव में संसद ही सर्वाेच्च है ! सदन में आम आदमी एक बार फिर से हार गया.देश के राजनेता एक दूसरे की  पीठ थपथपा रहे है कि हमने लोकपाल बिल पास नहीं होने दिया । अन्ना हजारे का मुंबई अनशन टूटने पर ,जेल भरो आंदोलन स्थगित होने पर, उनकी हार मान  कर सरकार में बैठे लोगो में खुशी की लहर दौड गयी । वास्तव में आम आदमी के रूप में अन्ना को तो हारना ही था !! इस देश में आम आदमी कभी जीता है क्या ? आजादी के पहले भी और बाद में भी आम आदमी हमेशा हारा ही है , आगे भी कभी जीत पायेगा इसकी सम्भावना कम हीै । सत्ता के दलालो से तो गाँधी जी भी हार गए थे ,उनकी फोटो लगाकर वोट मांगने वाले ,उनकी बात करने ,पूजा करने वालो ने आज तक उनकी भी कोई बात नहीं मानी । महात्मा गाँधी को अपना आदर्श मानने वाली कांग्रेस के महासचिव बी के हरिप्रसाद जब अन्ना हजारे को दो कौड़ी का आदमी बोलते है ,बेनी प्रसाद वर्मा ,मनीष तिवारी ,दिग्विजय सिंह आदि नेता भी अन्ना पर तीखे शब्द बाण चलाते रहते है .सरकार के खिलाफ आंदोलन ,धरने और प्रदर्शन करने वाले अन्ना ,हरिप्रसाद की नजर में यदि दो कौड़ी के आदमी है ,तो इसका मतलब मान लिया जाना चाहिए कि कांग्रेस विरोध के इन तरीकों को जायज नहीं मानती । राजनेता पूरी तरह से अन्ना हजारे के प्रति दुष्प्रचार में लगे हुए है ,कोई कहता है कि वे भगोड़े सिपाही है ,तो कोई उनको अमेरिका का एजेंट बताता है .वास्तव में उनका कसूर सिर्फ इतना है उन्होंने देश में फैले व्यापक भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सकारात्मक मुहिम छेड़ी और आम आदमी में एक विश्वास और जज्बा पैदा किया ।
बीते साल सरकार ने अपना पूरा जोर देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध हो रहे आंदोलनों को कुचलने ,निष्प्रभावी बनाने में लगा दिया .स्वामी रामदेव के अनशन पर रात में लाठीचार्ज फिर लगातार उन पर कार्यवाही । यही हाल टीम अन्ना के साथ हुआ ,पूरी टीम के एक एक सदस्य के पीछे देश का खुफिया विभाग लगा रहा ,सरकारी मशीनरी उनके खिलाफ काम करती रही । इन लोगो का कसूर सिर्फ इतना है कि इन्होने देश में फैले व्यापक भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन किया ।
काश देश की ये सरकारी मशीनरी भ्रष्ट नेताओ ,अधिकारियो के कारनामो को देश के सामने लाती । विदेशो में जमा काले धन  को लेकर भी सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया ,जबकि सर्वाेच्च न्यायालय ने कर अदायगी से बचने के लिए हसन अली सहित अन्य लोगों के विदेशी बैंकों में जमा काले धन के स्रोत का पता लगाने की दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाने के लिए कई बार केंद्र सरकार को फटकार लगाई। देश के बाहर भेजे गए धन का पता लगाने के लिए अब तक कोई सार्थक प्रयास नहीं किया गया। आज की तारीख में भी हमारे पास पुराने तथ्य मौजूद हैं। पिछले दिनों कैग की रिपोर्ट के अनुसार देश के पूरे कर का  ८७ प्रतिशत कर चोरी  १२ लोगो ने की है । लेकिन अब उसे वसूला नहीं जा सकता । तो सवाल यह उठता है कि इस दिशा में पहले कदम क्यों नहीं उठाये गए । वास्तव में सरकार ने इन लोगो के धन के स्रोत का पता लगाने की दिशा में कोई खास प्रगति नहीं की ।
लोकपाल बिल के एक बार फिर लटकने से देशवासियों में गहरी निराशा है ,पिछले ४३ सालो से किसी न किसी कारण यह टलता आ रहा है । सच बात तो यह है इसको लेकर कोई भी पार्टी संजीदा नहीं है ,सब लोग राजनीति कर रहे है । लोकपाल को पारित कराने की पूरी कवायद की अगर हम बात करें, तो कुल मिलाकर सभी ने मिलकर संसद और देश का समय खराब किया है। कोई भी सांसद अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं होने देना चाहता ,क्षेत्रीय दल नहीं चाहते कि राज्यों में लोकायुक्त बनाना जरुरी हो । कुल मिलाकर कोई भी पार्टी मजबूत लोकपाल नहीं चाहती । देश मे इतने बड़े पैमाने पर ऊपर से नीचे फैले भष्टाचार पर आम आदमी को राहत कब मिलेगी ?इस साधारण प्रश्न का जवाब हमारे ईमानदार कहे जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह  जी के पास भी नहीं है । उन्होंने नए साल के संकल्प पर भ्रष्टाचार मुक्त भारत का संकल्प लिया है । पर देश को वो सही दशा और दिशा कैसे देगे उसका जवाब अभी भी उनके पास नहीं है । 
देश में आम आदमी के साथ अन्याय अपनी सीमाए लाँघ चुका है,राजनीति अपनी मर्यादा खोती जा रही है । ऐसे में देश के बुद्धिजीवी वर्ग को आगे आना चाहिए । आगे आने वाले चुनाव में सभी राजनीतिक दलों से स्पष्ट पूछना चाहिए कि आपने अब तक हमारे लिए क्या किया है । वास्तव में जिस दिन इस देश की जनता जागरूक हो जायेगी ये लोग हमें बेवकूफ नहीं बना पायेगे । देशवासियो को जाति ,धर्म की राजनीति से ऊपर उठकर आगे आना ही होगा तभी इस देश में आम जनता की सुनी जायेगी ,राजनेता भी संजीदा होगे । जब तक आम आदमी जाति और धर्म की राजनीति में फस रहेगा । नेता लोग मनमानी करते रहेंगे ।     
अनशन स्थगित करने के बाद स्वास्थ्य कारणों से अब यह साफ हो गया है कि अन्ना हजारे विधानसभा चुनाव वाले पांच राज्यों में कांग्रेस के खिलाफ प्रचार नहीं करेंगे। यह एक अच्छा फैसला है ,इसको टीम अन्ना को भी मानना चाहिए क्योकि सिर्फ कांग्रेस के विरोध से कुछ हासिल नहीं होगा । उनकी मुहिम चुनावी चुनावी राजनीति ने नहीं उलझनी चाहिए । . 
चुनावी राजनीति के दंगल में राजनीतिक दलों को चित्त करना बहुत टेढ़ी खीर है उसके लिए जो संगठन, कौशल और रणनीति चाहिए वो शायद अभी अन्ना की टीम में नहीं है । ये एक बिल्कुल नए तरह का खेल है जिसके दाँव-पेंच समझना अभी इनके बस में नहीं है.इसलिए टीम अन्ना को अभी अधिक से अधिक आम जनता के बीच में जाना होगा ,उनको विश्वास में लेना होगा .साथ में हर फैसला सोच समझकर लेना होगा .फैसला लेने के बाद धैर्य दिखाना सबसे जरुरी है ।
वर्तमान  हालात में अन्ना हज़ारे और उनकी टीम द्वारा संचालित आंदोलन की प्रासंगिकता, उसके प्रभाव और आंदोलन के भविष्य को लेकर कई बातें की जाने लगी हैं। लेकिन हाल में ही एक निजी टीवी चौनल द्वारा कराये गए सर्वेक्षण के अनुसार अभी भी देश के ५२ प्रतिशत लोगो का विश्वास टीम अन्ना में बना हुआ है ,देश के आम आदमी की उम्मीदें अन्ना से जुडी हुई है इसलिए अब हर आंदोलन और अनशन को सजगता और धैर्य के साथ जनता को विश्वास में लेकर करना पड़ेगा क्योकि सत्ता से टकराना आसान नहीं है । इसमें देश के हर आम आदमी को अपना सकारात्मक योगदान देना होगा तभी भ्रष्टाचार मुक्त भारत का हमारा सपना पूरा होगा । देश के चिन्तनशील और अनुभवी लोगों के जाग्रत होने की जरूरत है। आवश्यकता इस बात की है कि देश के समझदार और संघर्षशील लोग खुले दिल व दिमाग से, इकट्ठा होकर एक मंच पर आएं। उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ इस मुहिम को और आगे ले जाना चाहिए। इससे धीरे-धीरे देश की परिस्थितियां सुधरेंगी एवं भ्रष्टाचार के विरूद्ध मुहिम को सही दिशा व गति मिलेगी।
लेखक 
शशांक द्विवेदी 

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