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Sunday, September 25, 2011

शिक्षा के बाजारीकरण का सरकारी प्रयास


गुणवत्तापूर्ण अभियांत्रिकी शिक्षा की आवश्यकता
अभियांत्रिकी शिक्षा के मौजूदा सत्र में इस बार पूरे देश में  काफी बड़े पैमाने पर सीटे खाली रह गई | अकेले राजस्थान में १७००० सीटे खाली रह गई जबकि उत्तर प्रदेश में यह आकड़ा ७०००० का है | यह पहली बार हो रहा है की एक तरफ तो सरकार उच्च शिक्षा के बाजारीकरण पर जुटी है वही दूसरी तरफ लोगो का रुझान इस तरफ कम हो रहा है| जबकि देश की उन्नति और विकास के लिए अभियांत्रिकी शिक्षा का ढांचा और मजबूत होना चाहिए पर सरकार सिर्फ इसे व्यावसाईक  बनाने में जुटी हुई है |
आज देश में बिना किसी गुणवत्तापूर्ण  शिक्षा की गारंटी के लगातार कॉलेज खुल रहे है | लोगो को यह एक अच्छा व्यवसाय नजर आने लगा है | पिछले दिनों  इस पर योजना आयोग ने  अपना ताजा दृष्टिकोण-पत्र जारी कर दिया है| आयोग चाहता है ऐसे उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना के लिए अनुमति दे दी जानी चाहिए, जिनका उद्देश्य मुनाफा कमाना हो। दृष्टिकोण-पत्र के मुताबिक 1 अप्रैल 2012 से शुरू हो रही 12वीं पंचवर्षीय योजना में उच्च शिक्षा, खासकर तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बड़ी भूमिका देने के लिए अनुकूल स्थितियां बनाने की जरूरत है। अभी इस दृष्टिकोण-पत्र पर सरकार की मुहर नहीं लगी है, इसके बावजूद यह सुझाव पिछले वर्षो के दौरान उच्च शिक्षा क्षेत्र के बारे में चली चर्चा के अनुरूप ही है। विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपनी शाखा खोलने की इजाजत के साथ भी यह बात जुड़ी हुई है कि वे सिर्फ मुनाफे की संभावना दिखने पर ही यहां आएंगे। 
व्यापारीकरण, व्यवसायीकरण तथा निजीकरण ने शिक्षा क्षेत्र को अपनी जकड़ में ले लिया है। मण्डी में शिक्षा क्रय-विक्रय की वस्तु बनती जा रही है। इसे बाजार में निश्चित शुल्क से अधिक धन  देकर खरीदा जा सकता है। परिणामत: शिक्षा में एक भिन्न प्रकार की जाति प्रथा जन्म ले रही है जो धन के आधार पर आई.आई.टी, एम.बी.ए., सी.ए. एम.बी.बी.एस आदि उपाधियों के लिये प्रवेश पा कर उच्च भावना से ग्रस्त ओैर धनाभाव के कारण प्रवेश से वंचित हीनभावना से ग्रस्त रहते है। दोनो ही श्रेणियों के छात्र ग्रस्त है। असमानता की खाई बढ़ रही है। सामाजिक असंतुलन और विषमता इस का ही परिणाम है।
दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली का ही परिणाम है की शिक्षा प्रदान करने वाली संस्था एवं शिक्षकों का एकमात्र उद्देश्य व्यावसाईक हितों के अनुरूप शिक्षा का बाजारीकरण करना हो गया है वही शिक्षा को ग्रहण करने वाले शिक्षार्थी का एकमात्र लक्ष्य शिक्षा को ग्रहण कर अधिक अधिक से नंबर लाकर अधिक से अधिक ऊँचे वेतन वाले ऊँचे पदों को प्राप्त करना मात्र रह गया है । फलस्वरूप व्यावसाईक एवं स्वार्थपरक व्यक्तित्व युक्ता युवा पीढ़ी का निर्माण हो रहा है । जो अधिक से अधिक भौतिक सुखों और सुविधाओं को प्राप्त करने हेतु भ्रष्ट्राचार , अनैतिक एवं अवैधानिक तरीकों और रास्तों को अपनी जीवन शैली तरजीह दे रहे हैं ।
आज से कई दशक पहले गाँधी जी ने कहा था की देश की समग्र उन्नति और आर्थिक विकास के लिए तकनीकी शिक्षा का गुणवत्ता पूर्ण होना बहुत जरुरी है उन्होंने इसको प्रभावी बनाने के  लिए कहा था  की कॉलेज में हाफ-हाफ सिस्टम होना चाहिए मतलब की आधे समय में किताबी ज्ञान दिया जाये और आधे समय में उसी ज्ञान का व्यावहारिक पक्ष बताकर उसका प्रयोग सामान्य जिन्दगी में कराया जाये | भारत में तो गाँधी जी की बाते ज्यादा सुनी नहीं गई पर चीन ने उनके इस प्रयोग को पूरी तरह से अपनाया |और आज स्तिथि यह है की चीन  उतपादन की दृष्टि में चीन भारत से बहुत आगे है ,भारतीय बाजार चीनी सामानों से भरे पड़े है|दिवाली ,रक्षाबंधन हमारे देश के प्रमुख त्यौहार है पर आज बाजार में सबसे ज्यादा पटाखे और राखिया चीन की ही बनी हुई मिलती है |
वास्तव में हम अपने ज्ञान को बहुत ज्यादा व्यावहारिक नहीं बना पाए है | नंबरों होड़ युक्त शिक्षा प्रणाली में  तो बस ग्रहण किये गया ज्ञान के आंकलन हेतु , रटे गए ज्ञान का लिखित परीक्षायों के माध्यम से मूल्याङ्कन से होता है । और इस तरह की मूल्यांकन और परीक्षा प्रणाली बच्चों को तनावग्रस्त करती है और वांछित सफलता न मिलने पर खुद को नुक्सान पहुचाने वाले अप्रिय कदम उठाने हेतु बाध्य करती है ।
आज देश में हजारो की संख्या में इंजीनियरिंग कॉलेज खुल गए है और लगातार खुल भी रहे है पर क्या इन संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी दे जा सकती है |यही वजह है आज लोगो का रुझान अभियांत्रिकी की तरफ कम होने लगा है और इन कॉलेज में सीटे  खाली रहने लगी है | जबकि देश के विकास के लिए हमें अधिक से अधिक योग्य इंजिनियर चाहिए ,आज चीन और जर्मनी में 80-80, कोरिया में 95, ऑस्ट्रेलिया में 70, ब्रिटेन में 60 फीसदी युवक तकनीकी शिक्षा से लैस हैं, जबकि भारत में तकनीकी शिक्षा पाने वाले नौजवानों का प्रतिशत महज 4.8 फीसदी है। देश की आबादी में प्रतिवर्ष 2.8 करोड़ युवा जुड़ जाते हैं तथा 1.28 करोड़ युवकों की लेबर फोर्स में एंट्री होती है, लेकिन इनमें से सिर्फ 25 लाख ट्रेंड होते हैं, जबकि मौजूदा अर्थव्यवस्था में जो रोजगार पैदा हो रहे हैं, उनमें 90 फीसदी ऐसे रोजगार हैं जिसमें तकनीकी शिक्षा की जरूरत होती है।
सरकार तकनीकी  शिक्षा प्रणाली में बदलाव के लिए जो  कदम उठा रही हैं। मसलन प्रवेश परीक्षाओं से लेकर सिलेबस तक में जो बदलाव किए जा रहे हैं। इन सबका एक ही मकसद है कि कैसे भारत  दुनिया के बाजार के लिए पेशेवर लोगों की फौज तैयार की जाए। इसके जरिये हम अपनी समस्याओं को नहीं तलाश रहे हैं बल्कि दुनिया के लिए प्रशिक्षित नौकर तैयार कर रहे हैं|सरकार को इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि उसके कदमों से देश का या देश की जनता का क्या फायदा होने वाला है। इस कदम से होगा क्या? इंजीनियरिंग और मेडिकल के असली ज्ञान का विकास हमारे नौजवान नहीं कर पाएंगे। बल्कि यह कार्य करेंगे पश्चिम मुल्क। जबकि हमारे नौजवान सिर्फ तकनीकी डिग्रियां हासिल कर वैश्विक बाजार में दोयम दर्जे की नौकरी कर रहे होंगे। इस पहल से तकनीकी ज्ञान की सस्ती फौज ही हम तैयार कर पाएंगे। तकनीकी क्षेत्र में नया कुछ नहीं कर पाएंगे। हां, हमारे नौजवानों को नौकरी मिल जाएगी और और इस सस्ती फौज की बदौलत दुनिया मुनाफा कमाएगी। इसलिए ऐसे प्रस्ताव से सिर्फ विदेशी कंपनियों को फायदा होगा क्योंकि उन्हें देश-विदेश में सस्ते में भारतीय पेशेवर मिलेंगे।
आज जरुरत है ऐसे तकनीकी ज्ञान की जो वास्तविकता की धरातल पर हो  साथ में व्यावहारिक भी हो जिससे हम  उसे अपने देश की परिस्थितियों के हिसाब से प्रयोग कर सके | देश के नौजवानों में इसे सिर्फ डिग्री लेने तक ही सीमित न रख पाए बल्कि उनके अन्दर इसे लेकर एक उत्साह हो ,समझ हो ,विश्वास हो कुछ सकारात्मक कर पाने के लिए |

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